1."परोपकार"
हमारे साथ तुम्हें परोपकार को बहुत महत्व दिया गया है। पेड़ों का फल देना तथा नदियों का अपना जल लुटाना परोपकार का एक रूप है। इसी तरह अनेक संपन्न व्यक्ति जरूरतमंद व्यक्ति के गाढे़ समय उनकी मदद के लिए आगे आते हैं। समाज में अमीर गरीब हर प्रकार के लोग होते हैं। ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें भरपेट भोजन भी नहीं मिलता। कुछ लोग ऐसे हैं, जिनके पास अकूत धन है। गरीब- गरीबों की भूख मिटाने के लिए काम करना और उनकी सहायता करना परोपकार है। हमारे देश में अनेक अस्पताल अपनी शिक्षा संस्थाएं परोपकार व्यक्तियों के दान में चल रहे हैं। समाज के कमजोर वर्ग के लोगों की सहायता के लिए अनेक संस्थाएं काम कर रही है।
उनका संचालन दान अथवा सहायता के रूप में प्राप्त धन से हो रहा है। हर युग में समाज के कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए परोपकारीयों का सहयोग प्राप्त होता रहा है। कहा गया है कि वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाता, नदी अपना जल स्वयं नहीं पीती। इसी तरह सज्जन (संपन्न) व्यक्तियों का धन भी परोपकार के लिए होता है।
2."भौतिक विकास के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याएं"
एक समय था जब धरती का बहुत बड़ा भाग घने जंगलों से ढका हुआ था। परंतु समय के साथ बड़ी जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगिक विकास, के कारण वनों को बहुत तेजी से काटा गया हजारों - लाखों वर्षों से सचित वन संपत्ति को हमने समाप्त कर दिया है।
आए दिन बढ़ते उद्योग - धंधों के परिणाम स्वरुप वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी जहरीली गैस बढ़ती जा रही है। ऑक्सीजन की कमी होने लगी है। हवा में अवाछित गैसें की उपस्थिति से मनुष्य को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इससे दमा, खांसी, त्वचा संबंधी रोग उत्पन्न ना हो रहे हैं। वायु प्रदूषण के कारण जीवन परिवर्तन आयु वर्षीय रोग तथा त्वचा के कैंसर के खतरे बढ़ रहे हैं वायु प्रदूषण से अम्लीय वर्षा के खतरे बड़े हैं। क्योंकि बारिश के पानी से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, जैसी जहरीली गैस के भूलने की संभावना बढ़ती है।
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